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أكـاد
أشـك
فـي
نفســي
لأنـي |
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أكـاد
أشــك
فيـك
وأنـت
منـي |
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يقـول
النـاس
إنك
خنـت
عهـدي |
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ولـم
تحفـظ
هـواي
ولـم
تصنّـي |
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وأنت
منـاي
أجمعـها
مشـت
بـي |
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إليـك
خطـى
الشبـاب
المطمئــن |
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وقـد
كـان
الشبـاب
لغيـر
عـود |
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يولـي
عن
فتـى
فـي
غيـر
أمـن |
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وهـا
أنـا
فاتنـي
القـدر
الموالـي |
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بـأحـلام
الشبـاب
ولـم
يفتـنـي |
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كـان
صبـــاي
قــد
ردت
رواه |
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علـى
جفنـي
المسـهد
أو
كـأنـي |
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يكـذب
فيـك
كـل
النــاس
قلبـي |
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وتسمـع
فيـك
كـل
النـاس
أذنـي |
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وكـم
طافـت
علـي
ظـلال
شـك |
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أقضـت
مضجعـي
واستبعـدتنـي |
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كأنـي
طـاف
بـي
ركـب
الليـالي |
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يحـدث
عنـك
فـي
الدنيـا
وعنـي |
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علـي
أنـي
أغالـط
فيـك
سمعـي |
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وتبصـر
فيك
غيـر
الشـك
عينـي |
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ومـا
أنـا
بـالمصـدق
فيـك
قـولا |
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ولكنـي
شقيــت
بحســن
ظنـي |
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وبـي
ممـا
يسـاورنــي
كثيــر |
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مـن
الشجـن
المـورق
لا
تدعنـي |
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تعـذب
في
لهيـب
الشـك
روحـي |
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وتشقـي
بـالظنــون
وبـالتمنـي |
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أجبـني
إذ
سـألتـك
هـل
صحيـح |
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حديث
الناس
خنـت
؟ أم
لم
تخنـّي
؟ |